"बेटियों पर आधारित कविता"
तितली हिरनी मोरनी
कोयल बत्तख मीन
सृष्टि पिता की बेटियां
कितनी शोभ हसीन...
क्या लिखूं वो परियों का रूप होती है
या कड़कती ठंड में सुहानी धूप होती है
वह होती है उदासी के हर मर्ज की दवा की तरह
या उमस में शीतल हवा की तरह
वह पहाड़ की चोटी पे सूरज की किरण है
या जिंदगी सही जीने का आचरण है
वो आंगन में फैला उजाला है
या मेरे गुस्से पे लगा ताला है
वो आकाशगंगा जो झिलमिलाती है
वह हंसी की नदी जो सिर्फ खिलखिलाती है
वह ताकत जो छोटे से घर को महल कर दें
वो काफिया जो किसी ग़ज़ल को मुकम्मल कर दे
वो अक्षर जो ना हो तो वर्णमाला अधूरी है
वो जो सबसे ज्यादा जरूरी है
यह नहीं लिखूंगा कि वो सास सास होती है
क्योंकि बेटियां तो सिर्फ एहसास होती है..
उसकी आंखें ना गुड़िया मांगती है ना खिलौना
घर कब आओगे बस एक छोटा सा सवाल सलोना
जल्दी आऊंगा..
जल्दी आऊंगा..
अपनी मजबूरी को छुपाते हुए देता हूं जवाब
तारीख बताओ टाइम बताओ
वो उंगलीयों पर करने लगती है हिसाब
और जब मैं नहीं दे पाता ना सही-सही जवाब
वो अपने आंसुओं को छुपाने के लिए
वो अपने चेहरे पर रख लेती है किताब...
वो मुझसे ऑस्ट्रेलिया में छुट्टियां,
मर्सिडीज कार की ड्राइव,
5 स्टार होटल में खाने
या नये नये आई फ़ोन नहीं मांगती है
न कि बहुत सारे पैसे वो अपने
गुल्लक में उड़ेलना चाहती है
वो बस कुछ देर मेरे साथ खेलना चाहती है...
और मैं वही बेटा काम है बहुत जरूरी काम है
नहीं जाऊंगा तो कैसे चलेगा
जैसे दुनियादारी के जवाब देने लगता हूं
और झूठे झूठे हिसाब देने लगता हूं
वो झूठा ही सही मुझे समझाती है
जैसे सब कुछ समझ गई हो
लेकिन वो आंखें बंद करके रोती है
सपने में खेलते हुए मेरे साथ सोती है
जिंदगी ना जाने क्यों इतनी उलझ जाती हैं
और हम समझते हैं कि बेटियां सब समझ जाती हैं,
और हम समझते हैं कि बेटियां सब समझ जाती है।
Written by:- Raj Laxman
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